ज़ोरों से चीख़ उठता है जब ग़म हमारा येख़ल्वत, ख़याल, खा़मुशी बनते सहारा येमतलब ये ज़िंदगी का हमें आ गया समझखोला जो ज़िंदगी ने दुखों का पिटारा येये एक दिन फ़रेब हुआ मुझ को जाने क्यूँशायद हो इक फ़रेब ही संसार सारा ये— Abhay Aadiv