ज़ोरों से चीख़ उठता है जब ग़म हमारा ये
ख़ल्वत, ख़याल, खा़मुशी बनते सहारा ये
मतलब ये ज़िंदगी का हमें आ गया समझ
खोला जो ज़िंदगी ने दुखों का पिटारा ये
ये एक दिन फ़रेब हुआ मुझ को जाने क्यूँ
शायद हो इक फ़रेब ही संसार सारा ये
— Abhay Aadiv
ख़ल्वत, ख़याल, खा़मुशी बनते सहारा ये
मतलब ये ज़िंदगी का हमें आ गया समझ
खोला जो ज़िंदगी ने दुखों का पिटारा ये
ये एक दिन फ़रेब हुआ मुझ को जाने क्यूँ
शायद हो इक फ़रेब ही संसार सारा ये
Other ghazal from the same pen
Shers of ehsaas.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling