देखा ख़ुद को यूँँ बेज़ार बनते

सामने दिल के दीवार बनते

इक नशे का ख़रीदार बनते
इस तलब का तलबगार बनते

हैं ख़फा करना ख़ूबी हमारी
कैसे हम आप के यार बनते

अब है अपनी तरफ़ हम किसी के
यूँ नहीं हम तरफ़-दार बनते

काम रिश्वत से बनता अभी भी
क्यूँकि अफसर न हक़दार बनते

इक कहानी की थी माँग ऐसी
उस में बस दो ही किरदार बनते

बे-दिली बे-क़रारी में आदिव
बिखरे अब बाल बेकार बनते

— Abhay Aadiv

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