बे सबब हाव-हू सी रहती है
दाँव पर आबरू सी रहती है
'इश्क़ जब भी किसी से होता है
इक 'अजब जुस्तजू सी रहती है
लम्हा दर लम्हा दिल मचलता है
हर पहर आरज़ू सी रहती है
यूँँ लगे की हर एक चेहरे पर
सूरत इक हू-ब-हू सी रहती है
मन भटकता है वन हिरन बनकर
ख़ुशबू इक रू-ब-रू सी रहती है
ख़ुद से ही अब वो बात करता है
दिल में इक गुफ़्तगू सी रहती है
जलके सब ख़ाक हो गये 'आज़ी'
फ़िर भी इक राख बू सी रहती है
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