जो मुयस्सर है यहाँ इतना भी उस पार न हो

ऐसी जल्दी में उधर जाने को तैयार न हो

देख सौदागर ये दुनिया कि कुछ देर के बा'द
तू तलबगार-ए-तमाशा हो तो बाज़ार न हो

सुर्ख़ी-ए-सुब्ह से सहमाए गए ख़्वाब और अब
आँख बेदार न हो सुब्ह नमूदार न हो

पेंच पड़ता है अभी रेत में और पाँव में
जिस किनारे पे लगा हूँ कहीं मँझधार न हो

ये अजब लोग हैं देते हैं तो इतनी तकरीम
कुछ को मंज़ूर न हो कुछ को सज़ावार न हो

यूँ उतारें तुझे दिल से कि तेरे जाने के बा'द
आँख बोझिल न रहे दिल पे कोई बार न हो

एक से एक यहाँ हल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-लतीफ़
पहली ही नर्म कलाई का गिरफ़्तार न हो

छोड़ रग़बत की अदाकारी ये मुमकिन ही नहीं
तब' शायर की हो मौजूद़ से बेज़ार न हो

— Abid Sial

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