जो मुयस्सर है यहाँ इतना भी उस पार न हो
ऐसी जल्दी में उधर जाने को तैयार न हो
देख सौदागर ये दुनिया कि कुछ देर के बा'द
तू तलबगार-ए-तमाशा हो तो बाज़ार न हो
सुर्ख़ी-ए-सुब्ह से सहमाए गए ख़्वाब और अब
आँख बेदार न हो सुब्ह नमूदार न हो
पेंच पड़ता है अभी रेत में और पाँव में
जिस किनारे पे लगा हूँ कहीं मँझधार न हो
ये अजब लोग हैं देते हैं तो इतनी तकरीम
कुछ को मंज़ूर न हो कुछ को सज़ावार न हो
यूँ उतारें तुझे दिल से कि तेरे जाने के बा'द
आँख बोझिल न रहे दिल पे कोई बार न हो
एक से एक यहाँ हल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-लतीफ़
पहली ही नर्म कलाई का गिरफ़्तार न हो
छोड़ रग़बत की अदाकारी ये मुमकिन ही नहीं
तब' शायर की हो मौजूद़ से बेज़ार न हो















