"वो कवि नहीं थे"
मार काट के नारे लग रहे थे
नारे लगाने वालों का चेहरा पोता हुआ था
उन्हें रोक पाना मुश्किल था
इंसानियत लहू-लुहान थी
संवेदनाओं के चिथड़े उड़े हुए थे
नफ़रत ने वातावरण का तापमान बढ़ा दिया था
तभी पुलिस की गाड़ी आ धमकी
सायरन सुन कर सभी भागने लगे
पर मैं वहीं खड़ा रहा
गाड़ी से उतर कर
एक पुलिस अफ़सर मेरे सामने आया
और उस ने मुझ से सवाल पूछा
कि हिंसा करने वाले लोग कौन थे?
मैं ने कहा हिंसा करने वाले लोग कवि नहीं थे
— Adarsh Akshar















