देता नहीं है साथ बुरे वक़्त में कोई
दुश्मन ख़ुदा हो दोस्त या परिवार अजनबी
जितनी भी मौज लेना है ले लो अभी सभी
मिलती नहीं किसी को दुबारा ये ज़िंदगी
देखो अब एक साँस भी बाक़ी नहीं बची
कितनी दफ़ा लगेगी मोहब्बत में हथकड़ी
चलना है ख़ुद ही राह में काँटे हों या हों फूल
फिर क्यूँ किसी से माँगना रातों में फुलझड़ी
मिलती नहीं फिर उस को ज़मानत भी चाह कर
लगती है जब किसी को मोहब्बत में हथकड़ी
जब नाम आ रहा है तो हक़ की लड़ाई लड़
तोहमत की ज़िंदगी से तो बेहतर है ख़ुद-कुशी
— Prashant Kumar














