बस यही हर्फ़-ए-हिकायात रहे आख़िर तक
हम कोई अहल-ए-ख़राबात रहे आख़िर तक
कैसे आबाद करेंगे वो किसी की दुनिया
ख़ुद जो बर्बादियों के पाथ रहे आख़िर तक
ग़म किसी को भी तो तन्हा नहीं रहने देता
सो यहाँ कौन मेरे साथ रहे आख़िर तक
आख़िरश जा के भी हम पा न सके उन के जवाब
ज़िंदगी से जो सवालात रहे आख़िर तक
अब नहीं चाह कि रौशन हो हमारी दुनिया
अब तो ख़्वाहिश है कि ये रात रहे आख़िर तक
— Adesh Rathore















