तलब थी ज़ौक़ था नफ़रत मुसलसल बे-दिली थी
तुम्हारे हिज्र से निकला तो दुनिया रो रही थी
सही बातों के भी तुम ने ग़लत मतलब निकाले
मैं कुछ समझा अगरचे बात तो कुछ और ही थी
कोई समझे न पर तेरा समझना लाज़मी था
तरीक़ा था ग़लत मेरा मेरी निय्यत सही थी
वही इक बात तुम भी इक दफ़ा कह देते मुझ से
वही जो बात मैं ने सौ दफ़ा तुम से कही थी
मैं दुनिया भर के लोगों से बहुत कुछ सीख आया
मगर वो बात जो मुझ को अभी तक सीखनी थी
मेरे घर से तेरी यादें बरामद हो चुकी हैं
मेरी हालत ने जो तस्दीक़ दी बिल्कुल सही थी
— Adesh Rathore















