नहीं है तेरे सिवा कोई राजधानी में
लगा सके जो अदाओं से आग पानी में
मगर वो कैसे मुहब्बत में साथ दे तेरा
हो रोज़गार की पर्वा जिसे जवानी में
जो देख ले वो मुझे देखता ही रह जाए
मैं क्या ही उम्दा कलाकार हूँ कहानी में
तू बात मान मुझे अपना बाग़बाँ न बना
उजड़ भी सकता है तू मेरी बाग़बानी में
न अब तमन्ना रही और न आरज़ू तेरी
तेरे बग़ैर बहुत ख़ुश हूँ ज़िंदगानी में
— Adesh Rathore















