kabhi awaaz de lete kabhi KHaamosh rahte the | कभी आवाज़ दे लेते कभी ख़ामोश रहते थे

  - Afzal Sultanpuri

कभी आवाज़ दे लेते कभी ख़ामोश रहते थे
नज़र उन से अगर मिलती तो हम मदहोश रहते थे

नहीं ऐसा नहीं था हम इबादत से रहे ग़ाफ़िल
कभी हम होश में आते कभी बेहोश रहते थे

न जाने क्यूँँ मेरे दिल को तुम अब बेचैन रखते हो
उठाया क्यूँँ ये पर्दा पहले तो रू-पोश रहते थे

कहीं पे जब मिरे बारे अगर ऐलान होता था
जिसे देखो वही हैरत हमा-तन-गोश रहते थे

किसे कह दूँ किसे बोलूँ नहीं कोई मिरी सुनता
मुझे पागल समझते लोग ख़ुद मय-नोश रहते थे

चलो इतना बता दो कौन है जो ख़्वाब में आया
कि जिस की बाहों में 'अफ़ज़ल' यूँँ हम-आग़ोश रहते थे

  - Afzal Sultanpuri

Chehra Shayari

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