कभी आवाज़ दे लेते कभी ख़ामोश रहते थे
नज़र उन से अगर मिलती तो हम मदहोश रहते थे
नहीं ऐसा नहीं था हम इबादत से रहे ग़ाफ़िल
कभी हम होश में आते कभी बेहोश रहते थे
न जाने क्यूँँ मेरे दिल को तुम अब बेचैन रखते हो
उठाया क्यूँँ ये पर्दा पहले तो रू-पोश रहते थे
कहीं पे जब मिरे बारे अगर ऐलान होता था
जिसे देखो वही हैरत हमा-तन-गोश रहते थे
किसे कह दूँ किसे बोलूँ नहीं कोई मिरी सुनता
मुझे पागल समझते लोग ख़ुद मय-नोश रहते थे
चलो इतना बता दो कौन है जो ख़्वाब में आया
कि जिस की बाहों में 'अफ़ज़ल' यूँँ हम-आग़ोश रहते थे
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