नज़्म: बद-नसीब

कभी कभी ये सोच कर मैं कितना बद-नसीब हूँ
कि ना तो माँ का प्यार मिल सका कभी
न बाप ने कभी मोहब्बतों भरी नज़र से देखा है मुझे
न हौसला मिला कभी बहन की ओर से
न भाई काम आ सका
न दोस्तों की दोस्ती में वो सुकूँ मिला
न इश्क़ का ग़मों पे कुछ असर हुआ
तो मेरा दिल मुझे इक और
ख़याल की दिशा में ले के जाता है कि
क्या अजब मिरा ग़ुरूर ही,
मिरी अना ही मेरा शुक्र अदा
न करना ही वजह है
मेरा इन तमाम रहमतों से दूर होने की
मगर वहीं ,
मुझे मिरा दिमाग़ इस ख़याल को
अलग ही ज़ाविए से पेश करता है कि
बद-नसीबी
भी किसी किसी पे खुलती है
इसे गुनाहों की सज़ा न जानिए
बस इस की वजह से ही मैं किसी तरह की बंदिशों के हल्के से घिरा हुआ नहीं हूँ
मेरे पाँव में किसी भी राब्ते की बेड़ियाँ नहीं हैं
और मैं दिमाग़ की सलाह को सही समझता हूँ
मैं आप सब में से बहुत अलग हूँ
मुझ को अपने आने वाले कल की फ़िक्र है
न अपनी बद-नसीबी से
किसी तरह का कोई ख़ौफ़ है
मैं जानता हूँ मेरा क्या बनेगा।
मुझ को अपने जैसे में शुमार करना
अब से छोड़ दीजिए
मैं बद-नसीब हूँ!

— Faiz Ahmad

More by Faiz Ahmad

Other nazm from the same pen

See all from Faiz Ahmad →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling