"कल फिर"

कल फिर तुम्हें ख़यालों में बनाया हम ने
कल फिर तुम्हारे साथ गुफ़्तगू की हम ने
कल फिर सब अपने ख़्वाबों को भुलाया हम ने
कल फिर कुछ अपनी हसरतें रुजू की हम ने
कल फिर सुख़न से तुझ को यूँ सजाया हम ने
कल फिर ग़ज़ल के पन्नों में उतारा हम ने
कल फिर तुझे बहुत किया था याद हम ने
कल फिर ख़ुशी से ग़म किया इजाद हम ने
कल फिर अकेलापन किया अज़ाद हम ने
कल फिर बुरी तरह रुलाया तुम ने हम को
कल फिर फ़क़ीर प्यार का बुलाया हम को
कल फिर जगह जगह न हक़ दबाया हम को
कल फिर बस इक मज़ाक़ सा बनाया हम को
कल फिर तुझे मनाना चाहा मेरे दिल ने
कल फिर मोहब्बतों की भीख़ मांँगी हम ने
कल फिर तिरी नज़र के हो गए प्यासे
कल फिर समंदरों की भीख़ माँगी हम ने
कल फिर तू जा रही थी बिन कहे कुछ हम से
कल फिर सो नफरतों की भीख़ माँगी हम ने
कल फिर ये ठाना तुम को याद न करेंगे
कल फिर मगर एहद ख़िलाफी़ हम करेंगे
कल फिर दोबारा तुम को याद हम करेंगे

— Faiz Ahmad

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