तुम्हारा ऐसे घर जाना बहुत तकलीफ़ देता है
लड़ाई हम से कर जाना बहुत तकलीफ़ देता है
ब-ज़ाहिर इश्क़ का इज़हार कर तो लेती है लेकिन
मगर उस का मुकर जाना बहुत तकलीफ़ देता है
वो जिस ने मुझ को हर इक मोड़ पे आकर सँभाला है
अब उस का यूँँ बिखर जाना बहुत तकलीफ़ देता है
बुलंदी से उतर कर कोई भी मरता नहीं लेकिन
निगाहों से उतर जाना बहुत तकलीफ़ देता है
जहाँ से चल के मीलों आ गए हैं सू-ए-मंज़िल हम
पलट कर फिर उधर जाना बहुत तकलीफ़ देता है
किसी से इश्क़ में मिनहाज दुश्वारी नहीं लेकिन
मगर हद से गुज़र जाना बहुत तकलीफ़ देता है
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