तू रहे या ना रहे साथ में दिलबर की तरहतुझ पे मैं हक़ भी जताऊँगा न शौहर की तरहदूर करने को ख़िज़ाँ जैसे बहार आती हैतुम भी आया करो हर साल दिसंबर की तरह— Abdullah Minhaj khan