हाल ऐसा है कुछ ग़रीबों का
नाम लेते नहीं खिलौनों का
तीरगी क्या हुआ इरादों का
सामना जब हुआ उजालों का
हक़ बयानी से उन का क्या रिश्ता
खा रहे हैं जो हक़ यतीमों का
इन की आदत फ़रेब ओ मक्कारी
ज़िक्र ही क्यूँ करें हसीनों का
जो भी आता है ज़ुल्म करता है
कौन दुनिया में है ग़रीबों का
वक़्त ए मुश्क़िल कोई नहीं अकबर
क्या करें कोई इन अज़ीज़ों का
— ''Akbar Rizvi"















