इस तरह हम तुम्हारा असर देखते ये हसीं लब ये ज़ुल्फ़ें नज़र देखते
शहरस जब तुम्हारे गुज़रते कभी तो तुम्हारी गली ख़ासकर देखते
ऐ सखी बे-तहाशा मोहब्बत तिरी मुझको हर रस्म से मावरा थी मगर
'उम्र तन्हा बिताने से अच्छा ये था तुम सफ़र में कोई हम-सफ़र देखते
ना-मुकम्मल सभी ख़्वाब हैं आज तक फिर भी बस एक दिल की ख़ुशी के लिए
चश्म-ए-हैराँ से बुनते किसी ख़्वाब को फिर उसी ख़्वाब को रात भर देखते
पेड़ है इक लगाया तिरे नाम का फूल हैं इसके बिल्कुल तिरे रंग के
तू नहीं है तो क्या हम तिरी याद में मर भी जाते अगर गुल-मोहर देखते
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