उसने आवाज़ दी तो आना पड़ा
दिल को फिर काम पर लगाना पड़ा
वो कहीं देख कर के रो न पड़े
इसलिए मुझको मुस्कुराना पड़ा
उसके छूने से ज़ख़्म भर जाते
ज़ख़्म गहरे थे तो छुपाना पड़ा
वो तो हर-दिल-अज़ीज़ था अब तक
फिर उसे हाथ क्यूँँ उठाना पड़ा
दिल में मैं रह गया कहीं उसके
बस निगाहों से दूर जाना पड़ा
कितना आसाँ था भूल जाना उसे
बस मुझे ख़ुद को भूल जाना पड़ा
सिर्फ़ उस रहनुमा की ख़्वाहिश में
हक़ नहीं था मगर जताना पड़ा
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