zane haseen thi aur phool chun kar laati thi | ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी

  - Ali Zaryoun

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी
मैं शेर कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी

अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था
वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी

"अली से दूर रहो", लोग उससे कहते थे
"वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी

"अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी"
गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी

ये फूल देख रहे हो, ये उसका लहजा था
ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी

मैं उसके बाद कभी ठीक से नहीं जागा
वो मुझको ख्वाब नहीं नींद से जगाती थी

उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था
ये बात मुझसे ज़्यादा उसे रूलाती थी

मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली"
कि उसको देखकर बस अपनी याद आती थी

  - Ali Zaryoun

Sach Shayari

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