sitaaron se aage jahaan aur bhi hain | सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

  - Allama Iqbal

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

  - Allama Iqbal

Duniya Shayari

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    मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को
    समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
    Rahat Indori
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    यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
    जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
    Allama Iqbal
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    अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास
    मैं तुम्हें कहता भी रहता था कि दुनिया तेज़ है
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    दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं
    Habib Jalib
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    तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते
    Ibrat Machlishahri
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    Ahmad Faraz
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    Divy Kamaldhwaj
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    Shashank Shekhar Pathak
    लगा जब कि दुनिया की पहली ज़रूरत मोहब्बत है तब उसने माना
    यक़ीं हो गया जब मोहब्बत ज़रूरत है तब उसने माना

    वगरना तो ये लोग उसे ख़ुदकुशी के लिए कह चुके थे
    उसे आइने ने बताया कि वो ख़ूबसूरत है तब उसने माना
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    Vikram Gaur Vairagi
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More by Allama Iqbal

As you were reading Shayari by Allama Iqbal

    ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगा
    सुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा

    गुज़र गया अब वो दौर साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वाले
    बनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगा

    कभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगे
    बरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ार-ज़ार होगा

    सुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
    जो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा

    निकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया था
    सुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगा

    किया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन में
    तो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह फट है ख़ार होगा

    दयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
    खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगा

    तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगी
    जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगा

    सफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ का
    हज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगा

    चमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली को
    ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा

    जो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखाया
    यही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगा

    कहा जो क़मरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैं
    तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा

    ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारे
    मैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा

    ये रस्म-ए-बरहम फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भी
    रहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगा

    मैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दरमाँदा कारवाँ को
    शह निशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शो'ला बार होगा

    नहीं है ग़ैर-अज़ नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी का
    तू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगा

    न पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
    कहीं सर-ए-रहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
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    Allama Iqbal
    समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा
    ग़लत था ऐ जुनूँ शायद तिरा अंदाज़ा-ए-सहरा

    ख़ुदी से इस तिलिस्म-ए-रंग-ओ-बू को तोड़ सकते हैं
    यही तौहीद थी जिस को न तू समझा न मैं समझा

    निगह पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल तजल्ली ऐन-ए-फ़ितरत है
    कि अपनी मौज से बेगाना रह सकता नहीं दरिया

    रक़ाबत इल्म ओ इरफ़ाँ में ग़लत-बीनी है मिम्बर की
    कि वो हल्लाज की सूली को समझा है रक़ीब अपना

    ख़ुदा के पाक बंदों को हुकूमत में ग़ुलामी में
    ज़िरह कोई अगर महफ़ूज़ रखती है तो इस्तिग़्ना

    न कर तक़लीद ऐ जिबरील मेरे जज़्ब-ओ-मस्ती की
    तन-आसाँ अर्शियों को ज़िक्र ओ तस्बीह ओ तवाफ़ औला

    बहुत देखे हैं मैं ने मशरिक़ ओ मग़रिब के मय-ख़ाने
    यहाँ साक़ी नहीं पैदा वहाँ बे-ज़ौक़ है सहबा

    न ईराँ में रहे बाक़ी न तूराँ में रहे बाक़ी
    वो बंदे फ़क़्र था जिन का हलाक-ए-क़ैसर-ओ-किसरा

    यही शैख़-ए-हरम है जो चुरा कर बेच खाता है
    गलीम-ए-बूज़र ओ दलक़-ए-उवेस ओ चादर-ए-ज़हरा

    हुज़ूर-ए-हक़ में इस्राफ़ील ने मेरी शिकायत की
    ये बंदा वक़्त से पहले क़यामत कर न दे बरपा

    निदा आई कि आशोब-ए-क़यामत से ये क्या कम है
    ' गिरफ़्ता चीनियाँ एहराम ओ मक्की ख़ुफ़्ता दर बतहा

    लबालब शीशा-ए-तहज़ीब-ए-हाज़िर है मय-ए-ला से
    मगर साक़ी के हाथों में नहीं पैमाना-ए-इल्ला

    दबा रक्खा है इस को ज़ख़्मा-वर की तेज़-दस्ती ने
    बहुत नीचे सुरों में है अभी यूरोप का वावैला

    इसी दरिया से उठती है वो मौज-ए-तुंद-जौलाँ भी
    नहंगों के नशेमन जिस से होते हैं तह-ओ-बाला

    ग़ुलामी क्या है ज़ौक़-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबाई से महरूमी
    जिसे ज़ेबा कहें आज़ाद बंदे है वही ज़ेबा

    भरोसा कर नहीं सकते ग़ुलामों की बसीरत पर
    कि दुनिया में फ़क़त मर्दान-ए-हूर की आँख है बीना

    वही है साहिब-ए-इमरोज़ जिस ने अपनी हिम्मत से
    ज़माने के समुंदर से निकाला गौहर-ए-फ़र्दा

    फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर हो गए पानी
    मिरी इक्सीर ने शीशे को बख़्शी सख़्ती-ए-ख़ारा

    रहे हैं और हैं फ़िरऔन मेरी घात में अब तक
    मगर क्या ग़म कि मेरी आस्तीं में है यद-ए-बैज़ा

    वो चिंगारी ख़स-ओ-ख़ाशाक से किस तरह दब जाए
    जिसे हक़ ने किया हो नीस्ताँ के वास्ते पैदा

    मोहब्बत ख़ेशतन बीनी मोहब्बत ख़ेशतन दारी
    मोहब्बत आस्तान-ए-क़ैसर-ओ-किसरा से बे-परवा

    अजब क्या गर मह ओ परवीं मिरे नख़चीर हो जाएँ
    कि बर फ़ितराक-ए-साहिब दौलत-ए-बस्तम सर-ए-ख़ुद रा

    वो दाना-ए-सुबुल ख़त्मुर-रुसुल मौला-ए-कुल जिस ने
    ग़ुबार-ए-राह को बख़्शा फ़रोग़-ए-वादी-ए-सीना

    निगाह-ए-इश्क़ ओ मस्ती में वही अव्वल वही आख़िर
    वही क़ुरआँ वही फ़ुरक़ाँ वही यासीं वही ताहा

    'सनाई' के अदब से मैं ने ग़व्वासी न की वर्ना
    अभी इस बहर में बाक़ी हैं लाखों लूलू-ए-लाला
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    Allama Iqbal
    मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे
    नज़्ज़ारे की हवस हो तो लैला भी छोड़ दे

    वाइज़ कमाल-ए-तर्क से मिलती है याँ मुराद
    दुनिया जो छोड़ दी है तो उक़्बा भी छोड़ दे

    तक़लीद की रविश से तो बेहतर है ख़ुद-कुशी
    रस्ता भी ढूँड ख़िज़्र का सौदा भी छोड़ दे

    मानिंद-ए-ख़ामा तेरी ज़बाँ पर है हर्फ़-ए-ग़ैर
    बेगाना शय पे नाज़िश-ए-बेजा भी छोड़ दे

    लुत्फ़-ए-कलाम क्या जो न हो दिल में दर्द-ए-इश्क़
    बिस्मिल नहीं है तू तो तड़पना भी छोड़ दे

    शबनम की तरह फूलों पे रो और चमन से चल
    इस बाग़ में क़याम का सौदा भी छोड़ दे

    है आशिक़ी में रस्म अलग सब से बैठना
    बुत-ख़ाना भी हरम भी कलीसा भी छोड़ दे

    सौदा-गरी नहीं ये इबादत ख़ुदा की है
    ऐ बे-ख़बर जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दे

    अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
    लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

    जीना वो क्या जो हो नफ़स-ए-ग़ैर पर मदार
    शोहरत की ज़िंदगी का भरोसा भी छोड़ दे

    शोख़ी सी है सवाल-ए-मुकर्रर में ऐ कलीम
    शर्त-ए-रज़ा ये है कि तक़ाज़ा भी छोड़ दे

    वाइ'ज़ सुबूत लाए जो मय के जवाज़ में
    'इक़बाल' को ये ज़िद है कि पीना भी छोड़ दे
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    Allama Iqbal
    कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
    कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में

    तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश हो
    वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में

    तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना
    कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में

    दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन
    न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में

    न कहीं जहाँ में अमाँ मिली जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
    मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में

    न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ
    न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं

    मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
    तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
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    Allama Iqbal
    ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी
    हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी

    तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद
    अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी

    मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी
    शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी

    शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही
    रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी

    इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने
    इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी

    सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात
    हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी

    तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख
    तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी
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    Allama Iqbal

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