वो एक शख़्स मुझे इतना प्यार देता है
मैं एक दूँ तो वो बदले में चार देता है
हैं जिस्म-ओ-जान मिरे इख़्तियार में उस के
वो रोज़ मुझ को मिरा जिस्म उधार देता है
वो यूँ भी इश्क़ का इज़हार मुझ से करता है
वो कहता कुछ नहीं बस आँख मार देता है
वो साथ है तो मिरा कुछ नहीं बिगड़ सकता
बलाएँ ले के वो आसेब उतार देता है
मैं आज जो भी हूँ उस में भी हाथ है उस का
सुख़न में आ के वो ग़ज़लें सँवार देता है
— Alok Kumar 'Tabiib'















