Alok Kumar 'Tabiib'

Alok Kumar 'Tabiib'

@alokdixit74u

Alok Kumar 'Tabiib' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Alok Kumar 'Tabiib''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कल रात में माज़ी मिरा फिर ख़्वाब में टकरा गया तक़सीम कर के दिल मिरा वो ज़ात में बिखरा गया — Alok Kumar 'Tabiib'
पापा के जूते पाँव में आने लगे मगर पापा को दोस्त कहने का साहस नहीं हुआ — Alok Kumar 'Tabiib'
पिता के साये से बेहतर तो कोई छाँव नहीं ये साएबान नहीं है तो कोई ठाँव नहीं — Alok Kumar 'Tabiib'
एक पलड़े में हूरें जन्नत की एक में जान-ए-मन हमारी है — Alok Kumar 'Tabiib'
इक शख़्स को ही दुनिया कहे जा रहा हूँ मैं इस दिल के गुनाहों की सज़ा पा रहा हूँ मैं — Alok Kumar 'Tabiib'
दिल के बदले दिल देने में अब तू मुझ से इनकार न कर ये इश्क़ का सौदा है प्यारे इस में तू कोई उधार न कर — Alok Kumar 'Tabiib'
रूठ कर जो भी गया मैं ने ख़फ़ा रहने दिया ख़त उसे हर दिन लिखा लेकिन पता रहने दिया — Alok Kumar 'Tabiib'
मैं सुख़न-वर हूँ करूँगा ख़ुदकुशी गर डूब कर जाते जाते इक ग़ज़ल दरिया पे कह जाऊँगा मैं — Alok Kumar 'Tabiib'
अगर छोड़ दे चाय गर्मी में पीना भरोसे के क़ाबिल नहीं वो हसीना — Alok Kumar 'Tabiib'
धूप में जो फूल थे मुरझा गए जी गए जिन को तिरी ज़ुल्फ़ें मिली — Alok Kumar 'Tabiib'
साल-हा-साल यूँ ही तुम मनाओ सालगिरह है दुआ हो न मरासिम में बहर-हाल गिरह — Alok Kumar 'Tabiib'
खींचा जो मैं ने तीर कमाँ से निकल गया बेटा मिरे हिसार से आगे निकल गया — Alok Kumar 'Tabiib'
अम्बानी बनना है न ही टाटा जैसा बनना है बच्चों की चाहत है उन को पापा जैसा बनना है — Alok Kumar 'Tabiib'
उस के चेहरे पे जो बिखरती है वो हँसी ला-जवाब होती है उस हसीना के घर के आगे जब मेरी गाड़ी ख़राब होती है — Alok Kumar 'Tabiib'
मुफ़्लिस की तरह दीद को तरसे हैं हम बहुत ख़ैरात देने आप सर-ए-बाम आइए — Alok Kumar 'Tabiib'
तिरी यादों के पंछी दिल को ऐसे घेर लेते हैं शजर को शाम को जैसे परिन्दे घेर लेते हैं — Alok Kumar 'Tabiib'
साल-ए-नौ में जो तिरी मुझ पे नज़र हो जाए जागे क़िस्मत मिरी ज़ुल्मत की सहर हो जाए — Alok Kumar 'Tabiib'
रंग नहीं था हाथों से बस गाल छुआ था वो तो हया से उस का चेहरा लाल हुआ था — Alok Kumar 'Tabiib'
ज़िन्दगी में तिरी कमी का मैं सोग कुछ इस तरह मनाता हूँ जब कभी चाय मैं बनाता हूँ उस में चीनी नहीं मिलाता हूँ — Alok Kumar 'Tabiib'
सुख़न की ज़माने में जब बात होगी हमारी ग़ज़ल से शुरूआत होगी — Alok Kumar 'Tabiib'

Ghazal

वो कभी ख़ुश कभी नाराज़ नज़र आता है मुख़्तलिफ़ उस का हर अंदाज़ नज़र आता है मैं तो कर लेता हूँ हर शय पे भरोसा जल्दी उस को हर शख़्स दग़ाबाज़ नज़र आता है उस के कंगन की खनक हो या बजे पैजनियाँ मुझ को हर गहने में इक साज़ नज़र आता है भीड़ कितनी भी हो पहचान नहीं है मुश्किल यार हर सम्त से मुमताज़ नज़र आता है दाँत से होंठ दबाए या उठा ले अबरू हर इशारे में मुझे राज़ नज़र आता है हम को लगता है कि मझधार में हैं इश्क़ में हम उस को ये इश्क़ का आग़ाज़ नज़र आता है लम्स में उस के है तासीर-ए-मसीहाई कुछ जिस्म कुछ अपना भी नासाज़ नज़र आता है — Alok Kumar 'Tabiib'