शब-ए-फ़िराक़ थी मैं था ग़रीब-ख़ाना था
था इंतिज़ार उसी का जिसे न आना था
किया था इश्क़ तो फिर यूँ न आज़माना था
किया था अहद तो फिर अहद को निभाना था
विदा हुई है जो गाड़ी में वो हसीना थी
लटक रहा है जो पंखे से वो दिवाना था
तमाम रात कटी मय-कदे में शाइर की
ग़ज़ल वो याद रही जिसको भूल जाना था
ये और बात वो पहचानता नहीं मुझ को
गली में उस की मिरा अब भी आना जाना था
मुशाइरे में जो मैं ने ग़ज़ल सुनाई तो
ज़बाँ पे सब की मिरे इश्क़ का फ़साना था
— Alok Kumar 'Tabiib'















