वो कभी ख़ुश कभी नाराज़ नज़र आता है
मुख़्तलिफ़ उस का हर अंदाज़ नज़र आता है
मैं तो कर लेता हूँ हर शय पे भरोसा जल्दी
उस को हर शख़्स दग़ाबाज़ नज़र आता है
उस के कंगन की खनक हो या बजे पैजनियाँ
मुझ को हर गहने में इक साज़ नज़र आता है
भीड़ कितनी भी हो पहचान नहीं है मुश्किल
यार हर सम्त से मुमताज़ नज़र आता है
दाँत से होंठ दबाए या उठा ले अबरू
हर इशारे में मुझे राज़ नज़र आता है
हम को लगता है कि मझधार में हैं इश्क़ में हम
उस को ये इश्क़ का आग़ाज़ नज़र आता है
लम्स में उस के है तासीर-ए-मसीहाई कुछ
जिस्म कुछ अपना भी नासाज़ नज़र आता है
— Alok Kumar 'Tabiib'















