अब हक़ीक़त में भी ख़्वाबों का गुमाँ होता है
दिल में गर आग हो आँखों में धुआँ होता है
अब के मिलना तो मुझे बाँहों में भर लेना तुम
दूर से वस्ल का एहसास कहाँ होता है
मेरे अफ़साने में हर चीज़ है उल्टी वरना
हिज्र से इश्क़ का आग़ाज़ कहाँ होता है
मुद्दतों तरसे हों हम एक झलक को जिस की
घर बुलाए वो तो विश्वास कहाँ होता है
— Alok Kumar 'Tabiib'















