माँ ने बचपन में कहा था कान में
सब है जाएज़ इश्क़ के मैदान में
जब भी लिखने बैठता हूँ कुछ नया
जान तुम रहती हो मेरे ध्यान में
फेसबुक पर भीड़ थी अहबाब की
चंद रिश्तेदार थे शमशान में
कह रहे थे लोग बुढ़िया मर गई
एक गुड्डा भी मिला सामान में
ज़िक्र जिन ग़ज़लों में तेरा आ गया
बस वही ग़ज़लें रखी दीवान में
— Alok Kumar 'Tabiib'















