बाग़बाँ समझता है तितलियाँ समझती हैं
फूल के मसाइल को लड़कियाँ समझती हैं
बे-वजह भटकता है कौन उन के कूचे में
कौन राह तकता है लड़कियाँ समझती हैं
सात रंग होते हैं लड़कों के लिए केवल
शेड सारे रंगों के लड़कियाँ समझती हैं
घर पिया के जाती हैं छोड़ के सभी रिश्ते
हिजरतों के रंज-ओ-ग़म बेटियाँ समझती हैं
ज़िन्दगी गुज़रती है रानियों की महलों में
ग़म क़फ़स में चिड़ियों का रानियाँ समझती हैं
— Alok Kumar 'Tabiib'















