जब अक़ीदत से कहीं ज़िक्र-ए-मुनव्वर होगा
सब के होंठों पे फ़क़त हर्फ़-ए-मुकर्रर होगा
ज़िक्र होगा जो कभी माँ पे कहे शेरों का
सबसे अव्वल में तिरा नाम मुनव्वर होगा
शाइरी में जो कहीं तख़्त-ए-सिकंदर होगा
देखना तख़्त-नशीं अपना मुनव्वर होगा
जो समझते हैं कि शाइर मिलेंगे दोज़ख़ में
देख लें जा के वो जन्नत में मुनव्वर होगा
जिस जगह दफ़्न है मिट्टी में मुनव्वर राना
ख़ुशबू-ए-गुल में भी एहसास-ए-मुनव्वर होगा
— Alok Kumar 'Tabiib'















