इतना रब्त बढ़ाया मैं ने मय-ख़ानों से
उल्फ़त है मुझ को साक़ी से पैमानों से
मय-ख़ाना मुझ से शब भर रौशन रहता है
याराना है मेरा सारे परवानों से
मय-ख़ाने के रिंद मुझे सज्दा करते हैं
मेरा तजरबा ज़्यादा है सब दीवानों से
सूफ़ी ग़ज़लें गाता हूँ मैं शाइर भी हूँ
मुझ को सुनने आते हैं बुत बुत-ख़ानों से
— Alok Kumar 'Tabiib'















