हक़ीक़तों को सदा कर के दर-किनार चले
ख़याल-ए-यार में हम ज़िन्दगी गुज़ार चले
किसी मुक़ाम पे दिल को मेरे क़रार नहीं
अज़ाब-ए-याद से निकले तो कू-ए-यार चले
मुझे भले न मिले पर ग़ज़ल को प्यार मिले
मिरी ग़ज़ल से किसी का तो कारोबार चले
उसी दुकान के बाहर खड़ा मिलूँगा तुम्हें
जहाँ लिखा था नक़द आज कल उधार चले
मैं उस की बज़्म में उस ज़ाविए पे बैठा हूँ
जहाँ से तीर-ए-नज़र दिल के आर पार चले
बराए-इश्क़ हम आए थे बे-क़रार बहुत
जो हम-किनार हुए और बे-क़रार चले
— Alok Kumar 'Tabiib'















