जान दी तो कभी यूँँ ही जाने दिया

सब को मर्ज़ी मुताबिक निभाने दिया

बीच आँगन लगा पेड़ काटा नहीं
घर परिंदों को मैं ने बसाने दिया

उम्र भर एक तारा रहे देखते
दुनिया ने आसमाँ में न जाने दिया

जब सताने लगा डर उसे शाम का
फिर छुड़ा कर उसे हाथ जाने दिया

जा के भी वो मिरे पास ही रह गया
बा'द उस के किसी को न आने दिया

— Aman Deep singh

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