शख़्स जो भी आज तक टकराया है मुझ सेे
आख़िरी में हर कोई उकताया है मुझ से
एक बस बर्बाद करना था मुझे ख़ुद को
वो भी अच्छे से नहीं हो पाया है मुझ से
एक का होना बहुत है इस ख़राबे में
बात को समझो मुहब्बत ज़ाया' है मुझ से
लग के बालों में ये ज़िंदा तो रहेगा ना
आपने ये फूल जो तुड़वाया है मुझ से
रोते बच्चे को खिलौने की तरह था मैं
उस ने अपना सिर्फ़ मन बहलाया है मुझ से
— Aman Deep singh















