"शाम का लम्हा"

शाम जब उतरती है ना तो ऐसा लगता है
जैसे आसमान ने अपने तमाम रंगों को समेट लिया हो
और अब बस ख़ामोशी की चादर ओढ़े
किसी अजनबी की याद में गुम हो गया हो
सड़क किनारे खड़े दरख़्त भी
कुछ थके-थके से मालूम होते हैं
जैसे दिनभर के शोर-गुल से ऊब कर
अब सुकून की पनाह ढूँढ़ रहे हों

मैं अक्सर इसी वक़्त ख़ुद से मिलता हूँ
वो मैं जो किसी को दिखाई नहीं देता
जो हँसते हुए भी ख़ामोश रहता है
जिस की आँखों में नमी तो होती है
मगर वजह पूछने वाला कोई नहीं

शाम का ये लम्हा कुछ कहता नहीं बस महसूस होता है
जैसे दिल के किसी कोने में कोई दिया जलता हो
कमज़ोर मगर ज़िंदा

— amit kumar gangle

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