दिल ये समझो कि खोया तो पल-भर में था

पर वो लम्हा तो सालों से मंज़र में था

एक दरिया ने छोड़ा था तन्हा जिसे
अब वो कतरा कहीं इक समुंदर में था

मैं नहीं कह रहा उस का पत्थर हैं दिल
पर ये मुमकिन हैं दिल उस का पत्थर में था

जिस के ख़ातिर ही सूरज जला उम्र-भर
चाँद वो रात के बस मुकद्दर में था

साथ उस के कहीं मैं पहाडों में हूँ
नींद टूटी तो देखा कि बिस्तर में था

मैं तो मरता हुआ भी दुआ दे गया
ख़ून देखा जो उस के ही ख़ंजर में था

— Ankit Dixit

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