"चरवाहा"
जैसे चरवाहा आवाज़ देने लगे
बकरियाँ उसकी जानिब जो चलने लगें
जिनको इक रोज़ जाकर वो बेच आएगा
उनको क्या है पता होने वाला है क्या
वो तो चरवाहा है कोई रहबर नहीं
मेरा रहबर भी रहबर नहीं था जिसे
मैंने रहबर कहा साथ चलता रहा
साथ रहकर वो रस्ता बदलता रहा
ऐसा होता रहा ऐसा होता गया
मुझको धोके में रक्खा उसी शख़्स ने
जिसको मैंने सर-ए-राह अपना कहा
साथ जिसके खड़ा था मैं हर मोड़ पर
उसको गुलशन में फल-फूल सब कुछ मिले
मैंने अपने लिए हाथ आगे किए
उसने देने से मुझको मना कर दिया
मेरी पलकों पे आँसू ठहर से गए
फिर ज़मीं पर गिरे इतना कहते हुए
ऐसा होता रहा ऐसा होता गया















