"जम्हूरियत"
ये वतन अब भी जलने को मजबूर है
और हाकिम नशे में बहुत चूर है
इक सियासत की रोटी पे ये पल रहे
इनका काफ़ी पुराना ये दस्तूर है
आग लगती है जब भी यहाँ से वहाँ
ख़ुश तो होते हैं अक्सर ये बे-इंतिहा
वो तो लोग और थे जो वतन पर मरे
अब तो मिलते नहीं ऐसे भी हम-रहाँ
ज़ुल्म वालों की सफ में खड़े दिख रहे
चंद सिक्कों की ख़ातिर ही ये बिक रहे
साफ़ दामन उन्हीं का अभी तक मिला
जो ख़िलाफ़त में इनका ही सच लिख रहे
बीच नफ़रत में सब को धकेला गया
खेल हम सब से कुछ ऐसा खेला गया
सब ने मारा है मिल कर उसी को यहाँ
जो भी सड़कों पे अबतक अकेला गया
— Ansar Eatvi















