मोहब्बत का बस इतना फ़लसफ़ा है
रज़ा-ए-यार ही रब की रज़ा है
वो जैसे नक़्श है मेरी जबीं पर
ख़ुदा-या देख तू ने क्या किया है
मैं अपनी ज़ात में लरज़ा हुआ हूँ
किसी आवाज़ ने ऐसे छुआ है
बस इतना राब्ता है मेरा उस से
मैं उस का अक्स हूँ वो आईना है
मैं अपने आप से ये पूछता हूँ
कोई ऐसे भी उलफ़त में मिटा है?
समुंदर की सी थी वुसअत अलम की
निकल कर आँख से कतरा हुआ है
ख़ुदा को तू ने क्या समझा है "ग़ाफ़िल"?
अरे नादाँ वो सब कुछ जानता है
— Ansh Ghafil















