हम शराफ़त से भी अपनी क़हर अब ढा ही रहे हैं
पर तुम्हारी याद के चक्कर हमें खा ही रहे हैं
अब नए कुछ यार हम भी तो बना बैठे यहाँ पर
पर जिन्हें हम छोड़ आए याद वो आ ही रहे हैं
ज़िन्दगी तू ने न जाने किस जगह ला कर उधेड़ा
सब हमें मुर्दा समझ यूँ नोंच कर खा ही रहे हैं
ग़ौर से देखो हमें तुम यार कोई लाश हैं क्या
कोई टिकता ही नहीं सब छोड़ के जा ही रहे हैं
कब तलक ऐसे जिएँगे राह कोई है न अपनी
राह मैं जब तक हैं तब तक गीत हम गा ही रहे हैं
रूह का कोई समर्पण भी करे तब बात होगी
ये ग़लत है तो है लेकिन जिस्म हम पा ही रहे हैं
— Anubhav Gurjar















