शाम सूरज के संग ढलते हैं

रात भर चाँदनी में जलते हैं

दिन में भी ख़ास कुछ नहीं करते
बस सड़क पर ही तो टहलते हैं

बोझ होता है धन कमाने का
सुब्ह कॉलेज जब निकलते हैं

आज भी सोचते हैं जब तुम को
तो ये आँसू बहुत उबलते हैं

हम तो पत्थर के हो गए ही थे
इक तुम्हें देख कर पिघलते हैं

बैठ जाओ बग़ल में तुम जब-जब
तब बहुत शब्द हम निगलते हैं

यार तुम साथ रह न पाओगी
हम तो कमरे बहुत बदलते हैं

रात भर आते ख़्वाब जो सारे
सुब्ह पैरों तले कुचलते हैं

ऐ सुनो जब शराब हम पी लें
तब तो हम सिर्फ़ सच उगलते हैं

— Anubhav Gurjar

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