Anubhav Gurjar

Anubhav Gurjar

@anubhavgurjar30

Anubhav Gurjar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Anubhav Gurjar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

Ghazal

हम शराफ़त से भी अपनी क़हर अब ढा ही रहे हैं पर तुम्हारी याद के चक्कर हमें खा ही रहे हैं अब नए कुछ यार हम भी तो बना बैठे यहाँ पर पर जिन्हें हम छोड़ आए याद वो आ ही रहे हैं ज़िन्दगी तू ने न जाने किस जगह ला कर उधेड़ा सब हमें मुर्दा समझ यूँँ नोंच कर खा ही रहे हैं ग़ौर से देखो हमें तुम यार कोई लाश हैं क्या कोई टिकता ही नहीं सब छोड़ के जा ही रहे हैं कब तलक ऐसे जिएँगे राह कोई है न अपनी राह मैं जब तक हैं तब तक गीत हम गा ही रहे हैं रूह का कोई समर्पण भी करे तब बात होगी ये ग़लत है तो है लेकिन जिस्म हम पा ही रहे हैं — Anubhav Gurjar
रात भर जाने किसी की अर्ज़ियाँ आती रही हैं इस लिए मुझ को बहुत सी हिचकियाँ आती रही हैं मैं अकेला बैठ कर तुम को भुलाना चाहता था ये हुआ है रात भर बस सिसकियाँ आती रही हैं अब के गर्मी ये शरारत संग मेरे हो रही है याद नानी घर बिताईं छुट्टियाँ आती रही हैं मन नहीं लगता यहाँ इस चीख़ती दिल्ली में मेरा दम घुटे जब याद माँ की लोरियाँ आती रही हैं एक दिन ताला लगाकर बंद ख़ुद को कर लिया था खोलने ताले को ख़ुद ही चाबियाँ आती रही हैं मुद्दतों के बा'द कमरे से निकलना जब हुआ है साथ मेरे पीछे-पीछे खिड़कियाँ आती रही हैं आए हैं बाज़ार सन्नाटा समेटे लौटते खन संग मेरे ख़ुद-ब-ख़ुद ही रस्सियाँ आती रही हैं देख आओ हाथ उस के वो कहीं पीले नहीं हों इस महीने गाँव में भी शादियाँ आती रही हैं इक तुम्हारे ख़त के ख़ातिर मैं न जाने क्यूँँ रुका हूँ याँ मुझे औरों की तो हद चिट्ठियाँ आती रही हैं साल भर उस के लिए कुछ लिख नहीं पाया ये सुन कर काटने को हाथ मेरे क़ैचियाँ आती रही हैं सिर झुकाने जब से मंदिर की कोई चौखट न देखी सो तभी से काम में आसानियाँ आती रही हैं कुछ दरिंदों की बदौलत देश की औरत दबी है देख लो बेटों से आगे बेटियाँ आती रही हैं — Anubhav Gurjar
आज मुझ को तुम्हें सताना है याद दिन आख़िरी दिलाना है सुब्ह जब मैं नहीं उठूँगा तब लट से मुखड़ा मेरा भिगाना है यार तुम क्यूँँ ग़ज़ल में आते हो अब वो क़िस्सा बहुत पुराना है मैं नहीं जानता कोई रिश्ता साथ माँ बाप का निभाना है चार लोगों की मत सुनो बातें काम बस मुँह के बल गिराना है मैं नहीं जा रहा यहाँ से अब कल मुझे ख़ुद को ही हराना है लड़खड़ाकर गिरूँ ज़मीं पर जब तब किसी को नहीं उठाना है तुम जहाँ पर खड़े सिफ़ारिश से ख़ुद से ही वो मुक़ाम पाना है भीड़ में खो गए क़रीबी कुछ अब उन्हीं का पता लगाना है तुम गए तो मुझे भी ले चलते अब अकेले सफ़र बिताना है वो जो दुष्यंत ने बनाया पुल अब उसी भाँति थरथराना है — Anubhav Gurjar