जहाँ-जहाँ गया मैं हूँ सभी बुरे अमीर हैं

दिलों के बादशाह हैं वो सब के सब फ़क़ीर हैं

समानता जो ला रहे थे कल के उस समाज में
वो एक ही रहीम और एक ही कबीर हैं

है डर रहे हैं आज भी जो राजनीति के तले
इधर-उधर गली-सड़क मरे-पड़े शरीर हैं

धकेल दें जो कृष्ण संग हाथ भर किसी भी क्षण
ये दानवीर की भुजा से छूट आए तीर हैं

डरो न तुम किसी भविष्य में लिखे पुराण से
सभी के हाथ में छिपी ये मौत की लकीर हैं

— Anubhav Gurjar

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