आज मुझ को तुम्हें सताना है
याद दिन आख़िरी दिलाना है
सुब्ह जब मैं नहीं उठूँगा तब
लट से मुखड़ा मेरा भिगाना है
यार तुम क्यूँ ग़ज़ल में आते हो
अब वो क़िस्सा बहुत पुराना है
मैं नहीं जानता कोई रिश्ता
साथ माँ बाप का निभाना है
चार लोगों की मत सुनो बातें
काम बस मुँह के बल गिराना है
मैं नहीं जा रहा यहाँ से अब
कल मुझे ख़ुद को ही हराना है
लड़खड़ाकर गिरूँ ज़मीं पर जब
तब किसी को नहीं उठाना है
तुम जहाँ पर खड़े सिफ़ारिश से
ख़ुद से ही वो मुक़ाम पाना है
भीड़ में खो गए क़रीबी कुछ
अब उन्हीं का पता लगाना है
तुम गए तो मुझे भी ले चलते
अब अकेले सफ़र बिताना है
वो जो दुष्यंत ने बनाया पुल
अब उसी भाँति थरथराना है















