कभी पीछे रही तुम दिल दुखाने से
मुझे तुम जान आई हो फ़लाने से
तभी तुम ने अदब से बात क्या कर ली
तो ख़ुद को ही जुदा जाना ज़माने से
तुम्हारी याद में दिन रात रोया हूँ
भुलाया अब इसे झट इक बहाने से
मिरे रुख़्सार पे सुर्ख़ी लगी ऐसी
कि रख के होंठ भूली हो हटाने से
उसे मैं हाल दिल का अब बताता ही
कि तब तक वो हुई पीछे निभाने से
मुझे फिर से दुबारा याद आया है
बहुत दुख हैं मता-ए-जाँ बनाने से
— Anubhav Gurjar















