नहीं पाई तुम्हारे हाथ वो ख़ैरात क्या होगीमिले जो बाप-दादास न वो शहमात क्या होगीमिटा कर कुल-घराने को बड़े तुम बन गए इक दिनजो पीछे घर नहीं होगा तो फिर औक़ात क्या होगी— Anubhav Gurjar