इस दिल को बेहद रोना आता है

जब बिन देखे मुझ को मुड़ जाता है

लाखों पत्ते गिर गिर के कहते हैं
आख़िर कैसे ख़ुद को बहलाता है

अपने वादे पर रहता है क़ाएम
ये ख़ूबी मुझ को भी सिखलाता है

हसरत वापस अपनी ले के जाते
उस का इनकार सब को तड़पाता है

कुछ बचकानी हरकतें बाक़ी उस
में
ख़ुद ग़लती कर के भी मुस्काता है

— anujlakhnavi

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