ढले दिन तो सूरज भी ढलने लगेगा
उजाला नदी में मचलने लगेगा
कभी पर्वतों की तरह बन के देखो
हवाओं का रुख़ भी बदलने लगेगा
ख़मोशी नहीं ये मिरा शोर-ए-दिल है
जिसे सुन के बुत भी पिघलने लगेगा
— Arbab Shaz
उजाला नदी में मचलने लगेगा
कभी पर्वतों की तरह बन के देखो
हवाओं का रुख़ भी बदलने लगेगा
ख़मोशी नहीं ये मिरा शोर-ए-दिल है
जिसे सुन के बुत भी पिघलने लगेगा
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