मुरादें सब हुईं पूरी मगर इक काम बाक़ी है
पिलाया जो नहीं साक़ी ने बस वो जाम बाक़ी है
समुंदर हो कि दरिया हो डुबोया है मुझे सबने
मगर तूफ़ाँ से टकराने का भी इकराम बाक़ी है
चला हूँ राह काँटों की लगे हैं ख़ार मुझ को भी
मगर मंज़िल को छूने में बचा इक गाम बाक़ी है
हज़ारों धोखे खा कर भी तिरे पहलू में दम भरता
मेरी तक़दीर में बस गर्दिश-ए-अय्याम बाक़ी है
मोहब्बत ख़ाक होने पर उठी ख़्वाबों की अर्थी भी
मगर साँसें चलाने को दिल-ए-नाकाम बाक़ी है
— arjun chamoli















