सच बोलने से मुल्क में डर लग रहा है अब
हर आम शख़्स ख़ाक-बसर लग रहा है अब
हर शहर में लहू की सियासत का रंग है
इंसाफ़ की कमी का असर लग रहा है अब
लाशें बिछा के रोज़ सियासत से खेलता
वो आदमी के ख़ून से तर लग रहा है अब
कंधों पे ढो रहा है वो सत्ता गुनाह की
इस बोझ से ज़मीन को डर लग रहा है अब
जिसने भी रौशनी की हिमायत में बात की
वो शख़्स तीरगी की ख़बर लग रहा है अब
लफ़्ज़ों का क़त्ल रोज़ ही अख़बार में हुआ
कुछ बोलना कठिन सा हुनर लग रहा है अब
हमने जो ख़्वाब बोए थे नफ़रत के खेत में
उनका हर एक फूल शरर लग रहा है अब
बचना ज़रा तू देख के दुनिया की ये फ़ज़ा
'अर्जुन' तेरा वुजूद लचर लग रहा है अब
— arjun chamoli















