तेरी बाँहों में होने की फ़रहत बाक़ी है

मेरे ख़्वाबों में होंठों की शिरकत बाक़ी है

मेरे हर नग़्में की धुन तू है ये कहना है
जो मेरे दिल ने लिखना है वो ख़त बाक़ी है

तेरी आँखों में डूबने की ख़्वाहिश है मेरी
हर पल तेरा साथ रहे ये हसरत बाक़ी है

हर करवट हर ज़ानिब बदल-बदल कर सोता हूँ
हर शब है तेरा इंतिज़ार वसलत बाक़ी है

अब मर जाऊँगा तो मुझ को ये दहशत होगी
दो जिस्म-ओ-जाँ के मिलने की लज़्ज़त बाक़ी है

— arjun chamoli

More by arjun chamoli

Other ghazal from the same pen

See all from arjun chamoli →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling