"महबूब की एक झलक"

रूह में उतर गई शक्ल उस की
जब नज़र उठाई तरफ़ उस की

रेशमी लिबास में ज़ीनत थी वो
दूध की तरह थी कमर उस की

कान पर झूलती उस की बाली
चूमती जाती थी गर्दन उस की

तन से लिपटी ख़म भरी साड़ी
दिखाती थी सुंदर कटि उस की

आँखों की बनावट बादाम जैसी
पूरे शबाब पर थी नज़र उस की

गोरे रंग के बीच गले का ख़म
कह रहा था चू
में नर्मी उस की

ज़िस्म की गढ़न थी यूँ ढली मूरत
आरज़ू हो कोई संग-तराश उस की

हाथ थे बुतों की तरह तराशे हुए
मक्खन जैसी फिसलन उस की

बालों की लंबी लटकन
छूती जाती कमर उस की

पैरों ने पाई थी सीधी गठन
केले के पेड़ सी उपमा उस की

खिंचता हुआ उठा सीना था
कसी हुई थी कमान उस की

खिलते लब भरे-भरे से थे
शहद से भरी पंखुड़ी उस की

फूल की तरह का परी-चेहरा
उजले रंग में सूरत उस की

और क्या मिसाल दें हम 'अर्जुन'
आफ़ताब जैसी झलक उस की

— arjun chamoli

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