"सवेरे की उजली रौशनी में घिरी वो लड़की"
सुब्ह उठ के वो निहारे खिलते नीले आसमाँ को
देखती वो उगता सूरज और महकाती समाँ को
पूछता सूरज उसी से उठ गई तो मैं भी आऊँ
रौशनी वो तब बिखेरे सुब्ह होने की समाँ को
रोज़ ही बाद-ए-सबा छू कर उसे लहराती है ज्यूँ
सोचता मैं वो न होती कौन लहराता समाँ को
फूल खिलने के लिए ही इंतिज़ारी में मचलते
और खिलते हैं चमन में जब निहारे वो समाँ को
रोज़ महक उस से चुराए ये सबा छू कर उसे ही
मिल रही ख़ुशबू सबास दे रही वो जो समाँ को
काश उस के सामने मेरा भी घर होता कहीं पर
देखता मैं सुब्ह उस को देखती वो जब समाँ को
— arjun chamoli















